महाभारत (Mahabhart) के युद्ध के सबसे बड़े योद्धा अर्जुन (Arjun) के गांडीव धनुष से पूरी दुनिया कांपती थी, अर्जुन को महाभारत काल का सबसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहा जाता है, अर्जुन के सामने परशुराम शिष्य भीष्म, कर्ण, खुद अर्जुन के गुरु द्रोणाचार्य तक नही टिक सके. महाभारत के युद्ध में अर्जुन इन सभी पर भारी पड़े थे, अर्जुन के अंदर वो काबिलियत थी कि वो अकेले ही पूरी सेना को शिकस्त दे सकते थे.
हालांकि क्या आपको पता है कि महाभारत के बाद जब कृष्ण ने देह त्यागने का फैसला किया, उसके बाद अर्जुन जो पूरी सेना पर अकेले भारी पड़ते थे, जंगल के कुछ डाकुओं से हार गए थे, उनकी गांडीव की शक्तियां काम नही आ रही थीं, इसका वर्णन हमारे पवित्र ग्रंथ महाभारत में भी वर्णित है.
भगवान कृष्ण के महाप्रयाण के बाद चली गईं Arjun की शक्तियां
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ के मौसल पर्व में इस घटना का वर्णन है, जब भगवान श्री कृष्ण ने महाप्रयाण का फैसला किया, तो उन्होंने अर्जुन को द्वारका बुलाया था. भगवान श्री कृष्ण के जाने के बाद द्वारका समुद्र में डूबने वाली थी, इसीलिए भगवान ने अपने परिवार की स्त्रियों और बच्चों की जिम्मेदारी अर्जुन को सौंपी और उन्हें अपने साथ हस्तिनापुर ले जाने के लिए कहा.
अर्जुन (Arjun) जब उन स्त्रियों और बच्चों के साथ हस्तिनापुर लौट रहे थे, तो रात में उन्हें जंगल में रुकना पड़ा, जहां उन्हें कुछ डाकुओं ने लुटने का प्रयास किया और अर्जुन उन्हें रोकने में असफल रहे, दरअसल अर्जुन का गांडीव अचानक गायब हो गया और उनकी सारी शक्तियां भी चली गईं.
दरअसल अर्जुन (Arjun) को जो शक्तियां मिलीं थी, वो उन्हें भगवान श्री कृष्ण की वजह से मिलीं थीं. वो शक्तियां अर्जुन की खुद की नही थीं, उन्हें भगवान श्री कृष्ण का साथ देने के लिए ये शक्तियां दी गईं थीं, लेकिन भगवान श्री कृष्ण के धरती लोक छोड़ते ही अर्जुन की शक्तियां भी भगवान के साथ चलीं गईं.
Arjun को हो गया अहसास कि समय से बलवान कुछ नही
अर्जुन (Arjun) को उन डाकुओं ने जब घेर लिया तो उन्हें रोकने के लिए उन्होंने अपना गांडीव उठाया, लेकिन वो उसकी प्रत्यंचा ही नही चढ़ा पा रहे थे, उन्हें वो सभी मंत्र भूल गए थे, जिसकी वजह से उनके तुणीर में बाण भरे रहते थे, जो तुणीर कभी खाली नही होती थी वो अब अर्जुन के किसी काम की नही थी. अर्जुन को उन डाकुओं से शिकस्त मिली और वापस लौटकर उन्होंने सारा वृत्तांत महर्षि वेदव्यास को बताया.
महर्षि वेदव्यास ने उन्हें बताया कि अब इस धरती पर उनका कार्य पूरा हो चूका है, भगवान श्री कृष्ण के साथ उनकी सभी शक्तियां वापस जा चुकी हैं, ऐसे में पांचो भाईयों ने राजपाट त्याग कर वैराग्य धारण करने का फैसला किया और हिमालय की ओर चल दिए. ऐसा माना जाता है कि पांडव उसके बाद स्वर्ग पहुंचने के लिए निकले, लेकिन स्वर्ग जीवित अपने शरीर के साथ सिर्फ युधिष्ठिर ही पहुंचे थे, बाकि पांडवों की और द्रोपदी की रास्ते में ही निधन हो गया था.
