कोरोना के बाद से गांवों में बढ़ी बेरोजगारी, फिर भी MANREGA के बजट में की गई कटौती, ये है वजह

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने 1 फरवरी को संसद में 2022-23 का बजट पेश किया है. जहां इस बजट ने सभी को राहत दी हैं वहीं मनरेगा(manrega) के बजट में कटौती की गई है. केंद्र सरकार की तरह से ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करते हुए ग्राम विकास के लिए फंड बढ़ा दिया गया है. जिसके बाद आम बजट में गांवों के विकास के लिए 1 लाख 35 हजार 944 करोड़ रुपये की रकम दी गई है, लेकिन कोरोना महामारी के बाद शहरों से लेकर गांवों तक बढ़ती बेरोजगारी के बीच मनरेगा के बजट में कटौती कर दी गई है.
2022-23 के बजट में MANREGA में की गई कटौती
कोरोना के बाद से देशभर में बेरोजगारी(Unemployment) बढ़ गई है. जिसके बाद से मजदूर शहर से गांव की तरफ पलायन करने लगे. वहीं उनके गांव जाने के बाद भी MANREGA की वजह से कोई परेशानी नहीं होती थी. आसानी से काम मिल जाता था. वित्त वर्ष 2022-23 में मनरेगा के लिए 73,000 करोड़ रुपये का ही बजट आवंटित किया गया है, जो इस साल के मुकाबले 25 फीसदी कम है. इस फाइनेंशियल ईयर में MANREGA के लिए 98 हजार करोड़ रुपये का बजट दिया गया था.
वहीं इस बार के बजट में बेरोजगारी की नजर से मनरेगा के बजट में कटौती बहुत ही चिंता की बात है. दरअसल लॉकडाउन के समय में मनरेगा ने गांवों में बड़ा आर्थिक संकट खड़ा होने से बचा लिया था. यहां तक कि शहरों से पलायन कर गांवों में पहुंचे प्रवासी मजदूरों को भी मनरेगा के चलते काफी मदद मिली थी. यूपी सरकार ने तो खास मिशन चलाकर मनरेगा स्कीम के तहत बड़ी संख्या में बेरोजगारों को कम दिया था.
मनरेगा में कटौती से विपक्ष हो सकता है हमलावर
ऐसे में नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडिया वीमन्स की प्रेसिडेंट अरुणा रॉय ने मनरेगा के बजट में कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा, कोरोना की वजह से ‘देश सर्वकालिक उच्च बेरोजगारी दर से गुजर रहा है, लेकिन सरकार यह नहीं सोच रही है कि मनरेगा के लिए उचित फंड जारी किया जाए. जिससे बेरोजगारों को कुछ काम देकर राहत प्रदान की जा सके. वहीं इस बजट में मनरेगा के फंड में कटौती की वजह से विपक्ष सरकार पर हमलावर हो सकता है. इस मुद्दे को विधानसभा चुनाव में राजनीतिक मुद्दा बनाकर मजदूरों को अपने पक्ष में ला सकता है.
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